Saturday, May 8th, 2021 Login Here
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यह हैरान करता है कि बीते वर्षों में तमाम चिंता और चेतावनी जताए जाने के बाद भी दिल्ली के पड़ोसी राज्यों और खासकर पंजाब एवं हरियाणा में पराली जलाया जाना शुरू हो चुका है। हालांकि इन राज्यों में पराली जलाए जाने की सूचना मिलते ही केंद्र सरकार सतर्क हो गई है, लेकिन ऐसा तो बीते वर्षों में भी होता रहा है। सर्दियों की आहट मिलते ही केंद्र सरकार के साथ-साथ राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी भी पराली जलाने के खिलाफ सक्रिय हो उठता है, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही रहता है।
इससे उत्साहित नहीं हुआ जा सकता कि पिछले वर्षों की तरह इस बार भी केंद्र सरकार दिल्ली के पड़ोसी राज्यों के पर्यावरण्ा मंत्रियों की बैठक बुलाने पर विचार कर रही है, क्योंकि अगर ऐसी कोई बैठक होती है, तो भी इसके प्रति सुनिश्चित नहीं हुआ जा सकता कि उत्तर भारत आसमान में छाने वाले धूल और धुएं के गुबार से बच सकेगा। हालांकि सभी इससे भली तरह परिचित हो चुके हैं कि धूल और धुएं के जहरीले गुबार से बना स्मॉग आम आदमी की सेहत के लिए गंभीर संकट पैदा करता है, लेकिन ऐसे ठोस उपाय नहीं किए जा रहे हैं, ताकि किसान पराली न जलाएं। भले ही एनजीटी के दबाव में राज्य सरकारें पराली जलाने से रोकने के कदम उठाने की हामी भर देती हों, लेकिन बाद में यही अधिक देखने में आता है कि वे कभी संसाधनों के अभाव को बयान करने लगती हैं और कभी किसान हित की दुहाई देने लगती हैं।
चूंकि पराली को जलाने से रोकने के मामले में जरूरी राजनीतिक इच्छाश्ाक्ति का परिचय देने से इनकार किया जा रहा है, इसलिए उत्तर भारत हर वर्ष सर्दियों के मौसम में पर्यावरण प्रदूषण की चपेट में आने को अभिशप्त है। यह समस्या इसलिए गंभीर होती जा रही है, क्योंकि पंजाब और हरियाणा के किसान धान की वे फसलें उगाने लगे हैं, जिनमें कहीं अधिक अवशेष निकलता है। यदि केंद्र और राज्य सरकारें पर्यावरण प्रदूषण की रोकथाम को लेकर सचमुच गंभीर हैं, तो उन्हें आपस में मिलकर ऐसे कदम उठाने ही होंगे, जिनसे किसान पराली जलाने से बचें। बेहतर होगा कि हमारे नीति-नियंता यह समझें कि पराली के निस्तारण का कोई कारगर तरीका अपनाने की जरूरत है। अगर यह दावा सही है कि किसानों को फसलों के अवशेष नष्ट करने वाले उपकरण सुलभ कराए जा रहे हैं, तो फिर पंजाब और हरियाणा से पराली जलाने की खबरें क्यों आ रही हैं? कहीं यह कागजी दावा तो नहीं? सच जो भी हो, लगता यही है कि पर्यावरण की रक्षा के लिए जो कुछ किया जाना चाहिए था, उससे कन्‍नी काट ली गई।
Chania