Friday, May 7th, 2021 Login Here
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पाकिस्तान ने भले ही शांति की पेशकश की हो, लेकिन अतीत में उसके व्यवहार को देखते हुए उस पर भरोसा करना मुश्किल है। बीते दिनों भारत और पाकिस्तान के सैन्य अभियान महानिदेशक यानी डीजीएमओ के बीच हॉटलाइन पर वार्ता हुई। उसमें 24-25 फरवरी की मध्यरात्रि से 2003 के संघर्ष विराम समझौते और समय-समय पर दोनों देशों के बीच हुई पुरानी संधियों को फिर से लागू करने पर सहमति बनी। यह एक बड़ी खबर थी, परंतु उसके प्रति भारतीय मीडिया लगभग उदासीन रहा। आखिर इसका कारण क्या है? यह घटनाक्रम बहुत हैरान करने वाला है, क्योंकि 2016 से 2019 के बीच पाकिस्तान प्रायोजित पठानकोट-उड़ी-पुलवामा आतंकी हमले और उसके बाद भारत द्वारा पाकिस्तान पर सफल सर्जिकल-एयर स्ट्राइक के बाद से दोनों देशों के संबंध गर्त में थे। यहां तक कि युद्ध की नौबत तक आ चुकी थी। इतना ही नहीं, वर्ष 2018 से लेकर फरवरी 2021 के बीच नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान 11 हजार से अधिक बार संघर्ष विराम का उल्लंघन कर चुका है, जिसका भारत ने करारा जवाब दिया। बकौल पाकिस्तानी सेना, भारतीय सैनिकों ने 2020 में तीन हजार से अधिक बार सीमा पर गोलीबारी की। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि पाकिस्तान शांति की बात करने लगा? इसके कई कारण लगते हैं। उनकी बारी-बारी से पड़ताल की जाए।

पहला कारण तो विश्व में इस्लामी कट्टरता, अलगाववाद और आतंकवाद विरोधी माहौल लगता है। फ्रांसीसी संसद द्वारा पारित विधेयक इसका उदाहरण है। स्वयं को गैर-अरबी वैश्विक मुस्लिम समाज का अगुआ मानने वाला पाकिस्तान जन्म से जिहाद और इस्लामी कट्टरवाद का एक केंद्र बना हुआ है। इसी कारण वह फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स यानी एफएटीएफ की ग्र्रे सूची में कायम है। दूसरा कारण पाकिस्तान की खस्ताहाल आॢथक स्थिति लगती है। उसकी हालत इतनी पतली है कि जनवरी में यात्रियों से भरा उसका विमान मलेशिया में जब्त कर लिया गया, क्योंकि पाकिस्तान ने एक विदेशी कंपनी का बकाया नहीं चुकाया था। मामला बाद में सुलझ तो गया, किंतु इससे पाकिस्तान को बहुत शर्मसार होना पड़ा। पाकिस्तान पर कोरोना से अधिक मार चीनी ऋण के बोझ से पड़ रही है। वित्त वर्ष 2019-20 में पाकिस्तान का सार्वजनिक ऋण उसके कुल सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के 87 प्रतिशत के बराबर हो गया। इस ऋण में बड़ा हिस्सा अकेले चीन का है। पाकिस्तान की स्थिति इतनी दयनीय हो गई है कि उसे अपना पिछला ऋण उतारने के लिए नया ऋण लेना पड़ रहा है। हाल में उसने सऊदी अरब का कर्ज उतारने हेतु चीन से फिर 1.5 अरब डॉलर का उधार लिया है। स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के अनुसार चीन-पाकिस्तान आॢथक गलियारा यानी सीपैक के निर्माण के कारण वर्ष 2017 में पाकिस्तान पर चीन का जो कर्ज 7.2 अरब डॉलर था, वह वर्ष 2020 में बढ़कर 30 अरब डॉलर हो गया। वर्ष 2024 तक इसके 100 अरब डॉलर पहुंचने के आसार हैं। अनुमान है कि पाकिस्तान को चीन का यह कर्ज चुकाने में लगभग 40 वर्ष लगेंगे।

पाकिस्तान की सोच में बदलाव का तीसरा कारण वर्ष 2017 में डोकलाम के बाद 2020-21 में पूर्वी लद्दाख पर चीन के खिलाफ भारत की कूटनीतिक विजय को माना जा रहा है। भारत ने अपनी शर्तों के अनुसार चीनी सेना को सीमा से पीछे हटने पर विवश कर दिया। इस दौरान चीनी सेना इतनी जल्दी में थी कि उसने पैंगोंग सो के दक्षिण तट से अपने 200 से अधिक युद्धक तोप/टैंक एक ही दिन में पीछे हटा लिए। यह इसलिए संभव हुआ, क्योंकि मौजूदा भारतीय नेतृत्व से चीन को दो-टूक संदेश मिला कि 1962 की तुलना में भारत अपनी सीमा, एकता और अखंडता की रक्षा हेतु कहीं अधिक तत्पर और स्वतंत्र है। इसका प्रमाण चीनी सत्ता अधिष्ठान को गलवन घाटी में सैन्य झड़प के बाद ही मिल गया था, जब भारतीय सैनिकों ने कैलास पर्वत शृंखला के उस क्षेत्र को फिर से अपने अधिकार में ले लिया, जो 1962 के युद्ध से पहले भारत के अधीन था। चीन को लेकर कूटनीतिक, सामरिक और आर्थिक मोर्चे पर उठाए गए भारतीय कदमों से भारत ही प्रभावशाली बनकर उभरा है। इससे पाकिस्तान को शायद अपनी और दुर्बलता का अहसास हुआ हो। यह भी उसके रुख में बदलाव का एक कारण हो सकता है।

यह भी किसी से छिपा नहीं कि 'इस्लाम-विरोधीÓ साम्यवादी चीन और वामपंथ से मुक्त इस्लामी पाकिस्तान के बीच अस्वाभाविक गठजोड़ का कारण इन दोनों देशों का भारत विरोधी एजेंडा ही है। जहां साम्राज्यवादी चीन पिछली सदी के छठे दशक से ही भारतीय भूमि पर गिद्धदृष्टि लगाए हुए है। वहीं पाकिस्तान का वैचारिक अधिष्ठान उसे भारत विरोधी प्रपंच रचने हेतु उकसाता रहता है। हाल ही में भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान का नाम लिए बिना स्पष्ट रूप से कहा कि कोई देश किसी अन्य आतंकी समर्थक देश के सशस्त्र हमले को विफल करने के लिए 'पहले ही हमलाÓ करने हेतु बाध्य हो सकता है।
पाकिस्तान और चीन को अपने घोषित भारत विरोधी लक्ष्यों की पूॢत हेतु एक-दूसरे की सहायता की अपेक्षा रहती है। अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए की समाप्ति और जम्मू-कश्मीर राज्य को केंद्र शासित प्रदेशों में बदलने के भारत सरकार के फैसले के खिलाफ चीन और पाकिस्तान ने वैश्विक मंचों पर माहौल बनाने की खूब कोशिशें कीं, लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। यह हास्यास्पद ही है कि कश्मीर में मानवाधिकारों की बात करने वाले चीन का स्वयं इस मामले में ट्रैक रिकॉर्ड बेहद खराब है। शिनजियांग में मुस्लिम शोषण, तिब्बत में बौद्ध-भिक्षु उत्पीडऩ, हांगकांग में लोकतंत्र समर्थकों के दमन और ताइवान में उसका दमन जारी है। वहीं पाकिस्तान तो अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के लिए कुख्यात ही है।
इस कड़ी में चौथा कारण अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के चीन विरोधी वक्तव्यों और विदेश नीति में निहित है। बाइडन ने सत्ता संभालते ही जिन दो विशेष कार्यदलों का गठन किया है, उनमें एक चीन से संबंधित है। इस दल में केवल अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन के अधिकारी हैं। स्पष्ट है कि चीन की चुनौती को बाइडन भी गंभीरता से ले रहे हैं। ऐसे में क्या पाकिस्तान के यकायक हुए इस कथित हृदय परिवर्तन पर भरोसा किया जा सकता है? सच तो यही है कि भारत-पाकिस्तान संकट का मुख्य कारण वह वैचारिक अधिष्ठान है, जो 'काफिर-कुफ्रÓ अवधारणा से कुप्रेरित है। इस विचार का अंतिम उद्देश्य भारत को आघात पहुंचाना है। अतीत इसका गवाह रहा है। जब 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मित्रता का संदेश लेकर लाहौर गए, तब बदले में भारत को कारगिल में धोखा मिला। इसी तरह जब दिसंबर 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मिलने अचानक लाहौर पहुंचे तो सप्ताह भर बाद पठानकोट आतंकी हमला हो गया। इसे देखते हुए भारत को कुटिल चीन के साथ कपटी पाकिस्तान से सचेत ही रहना होगा।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
Chania