Friday, June 18th, 2021 Login Here
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डॉ रविन्द्र कुमार सोहानी
ऋचविक ऋषि और सत्यवती के प्रसादिक पुत्र तथा अत्यंत जाज्वल्यमान ऋषि जमदग्नि और इक्ष्वांकु वंश के महाप्रतापी सम्राट प्रसेनजित की अत्यंत विदुषी पुत्री रेणुका के संयोग से जन्में पाँचवे पुत्र परशुराम को भारतीय मनीषा ने भगवान विष्णु के छटवें अवतार के रूप में प्रतिष्ठित किया है. वैदिक साहित्य की ऐसी मान्यता है कि ऋषि जमदग्नि ने अपने इस पुत्र का नाम 'राम' रखा था. कालांतर में अपने पिता की आज्ञा से 'राम' ने भगवान शिव की घोर तपस्या की तथा उन्हें प्रसन्न किया. वरदान स्वरुप देवाधिदेव महादेव ने अपना दिव्य परशु प्रदान किया, महादेव द्वारा प्रदत्त इस परशु को धारण करने के कारण वे जगत मे परशुराम के नाम से विख्यात हुए. वैदिक साहित्य में ऋषि को परिभाषित करते हुए कहा गया है --'ऋषति -गच्छति संसार -पारं इति' अर्थात इहलोक और परलोक के दर्शन (फिलॉसोफी )की स्पष्ट व्याख्या करने वाला व्यक्ति ही ऋषि है. ईर्ष्या, राग, द्वेष, लोभ, मोह, जय पराजय, तथा जीवन और मृत्यु से परे जो मनुष्यता के कल्याण के लिए अपना सर्वस्व समाज को अर्पित कर दे,वैदिक वाङ्ग्मय में ऐसे महामानवों को ऋषि की उपाधि से सुशोभित किया गया है. भगवान परशुराम के विषय में भारतीय लोक जीवन में दो कथाएं बहुप्रचलित हैं. पहली यह कि उन्होंने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अपनी माता का सिर धड़ से अलग कर दिया था. तथा दूसरी कथा है कि उन्होंने इस पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रिय विहीन कर दिया था. इन दोनों कथाओं के प्रतीकों, प्रतिमानों और प्रतिबिम्बों को दर्शन की गूढ़ता से समझने की आवश्यकता है. साहित्य का सृजन करते समय साहित्यकार श्लेष अलंकार का बहुदा उपयोग करते हैं, जिसमें एक ही शब्द के अलग अलग अर्थ होते है. हमें भी इसे इसी अर्थ मे स्वीकार करना होगा. पिता के कहने पर अपनी माता के किसी अनुचित कृत्य की घोर निंदा अथवा भर्त्सना करना उनकी हत्या करने के ही समान है. ठीक इसी प्रकार इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करने के पीछे भी एक गहन दर्शन छिपा हुआ है. भगवान परशुराम के समकालीन महाप्रतापी सम्राट सहस्त्रार्जुन को यह वरदान प्राप्त था की उसकी मृत्यु किसी भगवंत ता प्राप्त व्यक्ति के हाथों होगी. परशुराम ने उस काल मे सहस्त्रार्जुन के निरंकुश, आततायी, रजोगुण, अहंकार तथा उश्रृंखलता से परिपूर्ण राजसत्ता को उखाड़कर फेंक दिया. कालांतर मे इसी प्रकार की निरंकुश राजसत्ताओं को समाप्त कर उस काल मे सर्वकालिक तथा सर्वदेशिक मान्य स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लोकतान्त्रिक मूल्यों की प्राण प्रतिष्ठा करते हुए एक सर्वसमावेशी राज्य समाज व्यवस्था की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया. आज भारतवर्ष सहित समूचे विश्व मे जो आपा धापी मची हुई है और मनुष्य के अस्तित्व का जो संकट मुँह बाएं खड़ा हुआ है तब हम सबको पीछे मुड़कर देखना होगा बीसवीं सदी के आरम्भ में जिस 'नए मनुष्य' के जन्म की उदघोषणा से आकाश गुंजाएमान था वह उस सदी का अन्त देखने के लिए बचा नहीं रह सका, वहीं इसी के समानान्तर हमें यह भी विचारना होगा की क्या वह मनुष्य बचा रह सका, जो द्वितीय विश्वयुद्ध की खंदकों से निकलकर नई सदी के प्रकाश में आया था? आज हमें थोड़ा और ठहरकर इस प्रश्न पर विचार करना चाहिए की इस इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में मनुष्य वर्तमान प्रतिमा क्या मनुष्य की सनातन प्रतिमा के जैसी या उसके अनुरूप है. इक्कीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में हमारी शक्ल सूरत तो मनुष्य जैसी है किन्तु आज के इन आठ सौ पचास करोड़ मनुष्यों में से अधिकांश की छवि थोड़ी नहीं बहुत अलग है. मनुष्य की उभरती यह नूतन छवि ही चिंता और चिंतन का विषय है भगवान परशुराम की जन्म जयंती के अवसर पर हमें यह विचार ध्यान में रखना होगा की जीवन से बड़ी कोई चीज नहीं है जो लक्ष्य हो सके. जीवन खुद अपना लक्ष्य है. प्रायः जनता समय की धारा के साथ बहती है. प्रवाह के विरुद्ध तैरना अत्यंत साहस का कार्य है और इस कोशिस में डूबते समय भी पानी की सतह पर अन्तिम बार दिखती उंगलियां ही इतिहास रचती है. भगवान परशुराम का सम्पूर्ण जीवन वृत्त इस बात का सबल प्रमाण है की उन्होंने हर युग में प्रवाह के विरुद्ध तैरकर नए प्रतिमान स्थापित किए. राम युग मे अपने आराध्य शिवजी का धनुष भंग होने पर विष्णु के सातवें अवतार के मुख से यह कहलवाना --"नाथ संभु धनु भंज निहारा, होइहि केउ एक दास तुम्हारा". तथा इसी प्रसंग में प्रभु राम से यह तक कहलवा लेना --"राम मात्र लघु नाम हमारा, परसु सहित बड़ नाम तोहारा"भगवान परशुराम की जीवन मूल्यों के प्रति अगाध श्रद्धा उनकी जीवटता का प्रमाण है. अपना संदेह दूर करने के पश्चात् ही आपने विष्णु जी का धनुष प्रभु राम को सौंपा था. (राम रमापति कर धनु लेहू, खैंचहु मिटै मोर संदेहू") अपने मूल्यों से समझौता न करने का दूसरा प्रमाण द्वापर में सूर्य पुत्र कर्ण को सम्पूर्ण धनुर्विद्या सिखलाने के पश्चात् जब कर्ण का सत्य उनके समक्ष आया तो उसे शापित कर दिया. बाज़ार तथा विज्ञापन से संचालित और शासित इस कालखण्ड में लोगों की रूचि न इतिहास में है और न ही उन्हें इतिहास का बोध है. इतिहास बोध के प्रति यह उदासीनता ही इन लोगों को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक सकती है. अति महत्वाकांक्षा, मूल्य ह्रास और तुरत फुरत में बहुत कुछ हासिल कर लेने की प्रवृति के कारण मानवीय सम्बन्ध दरक रहें हैं और रिश्तों से फरेब की बदबू आने लगी है ऐसे दौर में भगवान परशुराम के समान 'निज'से ऊपर उठकर'पर 'की ओर हमारी चेतना का उर्धगामी विकास से मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त होने की प्रबल संभावनाएं छिपी हुई हैं. संकट और घटाटोप अँधेरे के इस कठिन दौर में मुझे वसीम बरेलवी साहब की पंक्तियाँ याद आ रही हैं --"उड़ान वालों उड़ानों पे वक़्त भारी है, परों की अब के नहीं हौसलों की बारी है". परशुराम जयन्ती की अशेष शुभकामनाओं के साथ..... इतिश्री.
Chania